कमाल के सवाल के कमाल – अमिताश ओझा

 कमाल के सवाल के कमाल – अमिताश ओझा

(चकमक, फरवरी 2008 में प्रकाशित) 


क्या तुम्हें लगता नहीं कि हम सब कुछ अजीब से हो गए हैं? हम बस जवाबों की ओर ध्यान देते हैं, सवाल पूछना तो हम भूल ही गए हैं। सवाल पूछने वालों को मूर्ख या पागल समझा जाता है जबकि सच तो यह है कि सही सवालों में ही सही जवाब छिपे होते हैं। जवाब ढूँढने से बड़ा काम है सही सवाल करना। जैसे पिछली सदी के एक बड़े वैज्ञानिक का उदाहरण लेते हैं –सर आइज़क न्यूटन। कहते हैं न्यूटन एक पेड़ के नीचे बैठे थे – हम सब बैठते हैं। अचानक एक सेब गिरा। ऐसा कोई पहली बार तो नहीं हुआ था। पर सवाल केवल न्यूटन ने ही किया। एक साधारण-सा सवाल कि सेब पेड़ से टूटकर नीचे ही क्यों गिरा, आसमान में क्यों नहीं उड़ गया? आज इस सवाल को महान माना जाता है। तो क्या न्यूटन से पहले यह सवाल किसी के दिमाग में नहीं आया होगा?

 

पूछूँ कि नहीं...?

ज़रा इन सवालों को देखो हम सवाल पूछने से डरते हैं। हमें लगता है कि अगर सवाल पूछ लिया तो सब को पता चल जाएगा कि मुझे नहीं आता। तब दुनिया क्या कहेगी?  कक्षा के बाकी बच्चे क्या कहेंगे? टीचर क्या सोचेंगे? स्कूलों में भी तो सिर्फ जवाब लिखना सिखाया जाता है, सवाल करना नहीं। अजीब सवाल पूछने वालों में सबसे पहला नाम सुकरात का आता है। हमने पढ़ा है कि उन्हें ज़हर दिया गया था।उनकी गलती सिर्फ इतनी थी कि उन्होंने बेहद साधारण सवाल किए। लोगों को यह सुहाया नहीं और उन्हें इसकी सज़ा मिली। उन्होंने जो सवाल किए उनके जवाब आज भी हमारे पास नहीं हैं। उनका एक सवाल था – ज्ञान क्या है? उन्होंने सभी से यह सवाल किया – आम लोगों से, विद्वानों से, विद्यार्थियों से, कलाकारों से। जवाब किसी के पास न था। सबको पता चलने लगा कि जो लोग विद्वान होने का दावा करते हैं उन्हें यह भी नहीं पता कि ज्ञान क्या है।

 

एक मज़ेदार कहानी

सुकरात एथेन्स में रहते थे। वहाँ के लोगों ने ज्ञान की देवी डेल्फी से प्रार्थना की और पूछा, “इस धरती पर सबसे ज्ञानी व्यक्ति कौन है?” देवी ने जवाब दिया, “सुकरात।”लोग सुकरात के पास गए और उनसे पूछा, “ज्ञान क्या है?” सुकरात बोले अगर उन्हें यह पता होता तो वे यह सवाल ही क्यों करते। सभी देवी के पास वापस गए और उनसे कहा कि जब सुकरात को स्वयं नहीं पता कि ज्ञान क्या है तो वह सबसे ज्ञानी व्यक्ति कैसे हो सकता है? देवी ने जवाब दिया, “सुकरात को यह पता है कि वो क्या नहीं जानता, इसलिए वह ज्ञानी है।”

 

मैं कौन हूँ ?

क्या तुम सोच सकते हो दुनिया का पहला सवाल क्या रहा होगा, जिसे शायद पहले प्राणी ने पूछा होगा? वह सवाल था, मैं कौन हूँ? है न अजब किस्म का सवाल? चलो हम मिलकर इसका जवाब खोजने की कोशिश करते हैं:

 

पहली कोशिश- 

इस सवाल को ऐसे भी पूछ सकते हैं –तुम जब सुबह उठते हो तो कैसे कह सकते हो कि मैं वही हूँ जो रात में सोया था? अजीब है न? पर फिर भी जवाब देने की कोशिश करो। चलो इतना बताओ कि क्या तुम्हारा शरीर ही तुम हो? कुछ लोग कहेंगे – हाँ। क्या हर सुबह तुम अपने आप को शीशे में देखकर सोचते हो – हाँ, मेरे हाथ वही हैं जो सोते समय थे, चेहरा भी वही है जो सोते समय था। अरे, ये पैर भी वही हैं! मान लो किसी सुबह तुम्हारा शरीर छिपकली का शरीर हो गया हो तो? तुमको आश्चर्य तो होगा पर क्या तुम बदल जाओगे? तुम सिर्फ यही सोचोगे कि अब मैं साइकिल कैसे चलाऊँ या स्कूल कैसे जाऊँ? लोग मुझे कैसे पहचानेंगे? पर तुम तो तुम ही रहोगे? तुम्हें क्या लगता है? चलो इस सवाल के जवाब में हम अपनी कल्पना को जहाँ तक ले जा सकते हैं ले जाएँ। एक और बात सोचो। मान लो राम नाम के व्यक्ति के हाथ किसी हादसे में कट गए। उसकी जगह श्याम के हाथ लगा दिए गए, जिसकी अभी-अभी मृत्यु हुई है। सवाल यह है कि अगर शरीर ही व्यक्ति की पहचान है तो अब राम कौन है और श्याम कौन है? क्योंकि श्याम का हाथ तो जीवित है। क्या हम कह सकते हैं कि अब राम राम भी है और श्याम भी? हाँ या न! यानी शरीर के बदल जाने के बाद भी हम नहीं बदलते।

 दूसरी कोशिश-

कुछ लोग कहेंगे कि हम वही हैं जो हमारी आत्मा है। हो सकता है यह जवाब सही लगे। पर हमें यह भी तो पता नहीं कि आत्मा क्या है। हम उसे न देख सकते हैं, न छू सकते हैं। अगर हम दावा करें कि रात सोते समय हमारी आत्मा बदल जाती है तो इसे कोई भी साबित नहीं कर सकता। यानी हमारे सवाल का जवाब अभी भी नहीं मिला।

 तीसरी कोशिश-

अब क्या करें? क्या हम कह सकते हैं कि हमारी यादें और हमारे अनुभव ही हमें बनाते हैं। पर इसमें भी एक परेशानी है। मान लो कि राम की याददाश्त खो गई है। तो क्या अब राम राम नहीं रहा, कोई और हो गया? एक बार फिर अपने मुख्य विषय पर आते हैं। हमारा यह प्रयास सवाल में से एक और सवाल खोजने का है। मान लो कि विज्ञान इतनी तरक्की कर ले कि हम किसी के दिमाग से उसकी सारी याददाश्त निकालकर एक मशीन में जमा कर लें। ऐसा हो सकता है? हम कैसे कह सकते हैं कि ऐसा नहीं हो सकता? जैसे आज से सैंकड़ों साल पहले हमने कभी नहीं सोचा होगा कि हम मीलों दूर की घटनाओं को अपनी आँखों के सामने होता देख पाएँगे। पर आज हम देखते हैं। हो सकता है कि आने वाले कुछ सालों में मस्तिष्क से याददाश्त निकालने की मशीन बन जाए।मान लो एक प्रयोग में हमने राम और श्याम के मस्तिष्क से उनकी याददाश्त निकालकर एक-एक मशीन में जमा कर दी। फिर राम की याददाश्त श्याम में और श्याम की राम में डाल दी। इस प्रयोग के बाद सवाल यह है कि अब राम कौन है और श्याम कौन है? ऊलजुलूल तो नहीं लगा यह सवाल?

चित्र - अतनु रॉय 


तो क्या मिला जवाब ?

हमें पहले सवाल का जवाब तो नहीं मिला, पर देखो एक छोटे-से सवाल से इतने सारे सवाल खड़े हुए, जिनका हमने जवाब दिया। और इस प्रक्रिया में हमने अपनी सारी कल्पनाशक्ति लगा दी। कितना सोचा, कितने ही तर्क दिए। सच मानो, एक साधारण-सा सवाल हमें कई ऐसे सवाल पूछने को बाध्य करता है जिन्हें हमने सोचा भी नहीं था। और इस पूरी प्रक्रिया का नतीजा? हमारा ज्ञान जो हमारे जीवन को और विकसित बनाने के काम आना चाहिए।

 

सवाल पूछने की कला

ऐसे न जाने कितने ही सवाल मानव इतिहास में भरे पड़े हैं। कुछ के उत्तर मिले, कुछ के नहीं मिले। आने वाले समय में और भी न जाने कितने सवाल होंगे। अगर तुम सवाल करने के आदी हो जाओगे तो एक दिन ज़रूर ऐसा सवाल पूछ बैठोगे जो सारी मानव सभ्यता को एक नई दिशा देगा। इससे लोगों के बीच भाईचारा और बढ़ेगा। सवाल पूछने की इस कला को दर्शनशास्त्र कहते हैं। घर से स्कूल के रास्ते में तुमको कितने ही सवाल मिल जाएँगे। अपने आसपास की घटनाओं को ज़रा गौर से देखो। उनके बारे में सोचो और पूछो कि क्या उनका घटना ज़रूरी था। इन घटनाओं का लोगों पर क्या असर होगा? यदि हाँ तो कैसे और नहीं तो क्यों?  तुम अपने सवाल चकमक के पते पर भेज सकते हो, हम किसी अंक में उन पर चर्चा कर सकते हैं।

 

 

क्यों ?

 मैं समझ नहीं पाती
क्यों नीला है आसमान या
क्यों हरी है घास या
क्यों लाल होते हैं गुलाब या
क्यों समुद्र नीला होता है।
लेकिन जो सबसे ज़्यादा मैं
समझ नहीं पाती
क्यों दुनिया है
गोल
और जो सबसे ज़्यादा समझती हूँ
वह यह है कि क्यों हरे होते हैं जंगल।

- क्रिस्टी मेयेर, नौ साल, अमरीका
अनुवाद: तेजी ग्रोवर
(यह कविता पोयम्स बाई यंग अमेरिकन्स से ली गई है।)

 

हथेली पर बाल क्यों नहीं जमते?

एक दिन बादशाह ने बीरबल से पूछा, “मेरी हथेली पर बाल क्यों नहीं हैं?” बीरबल ने जवाब दिया, “हुजूर, आप रोज़ इन्हीं हाथों से इतना दान दिया करते हैं, जिसकी रगड़ से बाल नहीं जमने पाते।”बादशाह यह सुन मन-ही-मन प्रसन्न हुए। बादशाह ने फिर पूछा, “पर बीरबल तुम्हारी हथेली पर बाल क्यों नहीं हैं?” बीरबल ने उत्तर दिया,“बादशाह सलामत, दान लेते-लेते उसकी रगड़ से मेरी हथेली पर बाल नहीं उगे।” बादशाह चुप हो गए। उन्होंने फिर प्रश्न किया, “तो हमारे दरबार के अन्य लोगों की हथेली पर बाल क्यों नहीं उगते?”बीरबल मुस्कुराए, “हुजूर, इसका जवाब तो बिल्कुल सीधा-सादा है। जब आप मुझको व अन्य जनों को दान देने लगते हैं, तब दरबारी बेचारे ईष्र्या से अपने हाथ मलते हैं। इसी रगड़ से इनकी हथेलियों पर बाल नहीं उगते।”



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