बाघों का शिकार का एक किस्सा...

 बाघों का शिकार - अमित कुमार


चित्र - दिलीप चिंचालकर

मध्यप्रदेश में है पन्ना का समृद्ध राष्ट्रीय उद्यान। 543 वर्ग किलोमीटर में फैला यह उद्यान बाघ, तेन्दुए, साम्भर, चिंकारा, रीछ, लोमड़ी, जंगली बिल्ली जैसे न जाने कितने जीवों का घर है। मैं डिस्कवरी चैनल के लिए बाघों पर एक फिल्म बना रहा था। वह करीब आठ महीने का प्रोजेक्ट था जिसमें बदलते मौसम में बाघ की दिनचर्या में आनेवाले बदलावों का अध्ययन करना था। टीम में मेरे साथ दो कैमरामैन और दो सहायक थे। पन्ना राष्ट्रीय उद्यान के अधिकारी भी समय-समय पर साथ रहते थे। उद्यान के निदेशक ने मुझे जंगल के उत्तर-पूर्वी इलाके में काम करने का सुझाव दिया। यह जंगल का काफी समृद्ध इलाका है। यहाँ दो जलाशय, घास के मैदान, साल का घना जंगल और थोड़ा चट्टानी क्षेत्र था। हमें बताया गया कि यह चार बाघिनों और दो बाघों का इलाका है। नर बाघ मादा के इलाके में आते-जाते रहते हैं पर कोई दूसरा नर वहाँ आ जाए तो उसे घुसपैठिया समझा जाता है। अपने सहयोगियों के साथ मैं तीन दिनों तक उस इलाके में घूमा। और फिर चार जगहों पर कैमरा सेट किए और दो पेड़ों पर मचान तैयार कराई। अब हम फिल्म शूट करने के लिए तैयार थे...





सबसे पहले हमें बाघिन दिखी। एकदम जवान और फुर्तीली। हमने उसका नाम ही फुर्तीली रख दिया। अब वो चौबीसों घण्टे हमारे कैमरों की निगरानी में रहने लगी थी। हर डॉक्यूमेंट्री फिल्म लैब में एडिट होने के बाद ही सही मायनों में फिल्म बनती है। दो सौ से ज़्यादा घण्टों की रिकॉर्डिंग से कोई एक घण्टे की फिल्म बनती है।

वह कड़क जाड़े का महीना था। पूरा जंगल कँपकँपा देनेवाली ठण्ड में सिमटा था। कोहरे से जंगल की रफ्तार सुस्त पड़ गई थी। जंगल में काम करना साहस और धैर्य दोनों की ज़बरदस्त माँग करता है। सप्ताह भर बाद जब सूरज दुबका हुआ-सा निकला तो जंगल में जैसे गति आ गई थी। मचान पर बैठे हम भी धूप का आनन्द ले रहे थे कि सामने घास के मैदान में फुर्तीली घात लगाती हुई एकदम से प्रकट हो गई। वह एक चीतल पर ध्यान लगाए हुए थी और घास पर दबे पाँव धीरे-धीरे सरक रही थी। जब चीतल उसकी पकड़ की हद में आ गया तो फुर्तीली ने छलाँग लगाई। अगले ही पल चीतल की गर्दन फुर्तीली के जबड़ों में थी। कुछ देर ज़मीन पर पैर पटकने के बाद वो चीतल एकदम शान्त हो गया। फुर्तीली ने उसे छोड़ा और उसकी बगल में लेटकर सुस्ताने लगी। कुछ देर बाद वह उठी और चीतल की लाश को खींचकर झाड़ियों के बीच ले गई। घूमकर लाश का मुआयना करने के बाद वह उसके पिछले भाग की ओर बैठ गई। और उस हिस्से को चाटने लगी।

जंगल के मेरे अनुभव बताते हैं कि बाघ अपने शिकार को जहाँ से खाना शुरू करता है उस हिस्से को पहले चाटकर गीला कर लेता है। शायद इससे वहाँ की खाल काटने में आसानी होती हो। आधे घण्टे तक बेफिक्री से खाने के बाद वह पहलेवाली जगह पर जाकर फिर से सुस्ताने लगी। चीतल का एक बड़ा हिस्सा अब भी वहीं पड़ा था। तभी वहाँ एक दूसरा बाघ आता दिखा। फुर्तीली की ही तरह जवान, पर कद-काठी में उससे थोड़ा बड़ा। चीतल की लाश के पास आकर उसने उसे सूँघा। नए बाघ की इस हरकत की खबर जैसे ही फुर्तीली को हुई वह एकदम-से उठी और गुर्राते हुए उस बाघ पर झपटी। बाघ कुछ कदम पीछे हुआ और फिर हलकी गुर्राहट से उसने जवाब दिया। उसकी गुर्राहट में गुस्सा नहीं था। वह फुर्तीली से दोस्ती करना चाहता था। फुर्तीली फिर से लेट गई। बाघ उसके पीछे जाकर दोस्ती की मनुहार करने लगा। थोड़ी देर बाद फुर्तीली उठी और बचे हुए चीतल को फिर से खाने लगी। बाघ फुर्तीली को खाते देखता रहा फिर कुछ देर बाद वह भी खाने लगा। फुर्तीली ने कोई विरोध नहीं किया। उस दिन से वे दोनों साथ-साथ रहने लगे।
बाघ एकाकी जीव होते हैं। ये आजीवन अकेले रहते हैं। परिवार वृद्धि के समय नर-मादा कुछ दिनों के लिए साथ रहते हैं। मादा बच्चों को जन्म देकर उनके बड़ा होने तक उनके साथ रहती है।

दोनों को साथ-साथ रहते एक सप्ताह से ज़्यादा हो गया था। इस बीच फुर्तीली ने एक साँभर का शिकार किया जिसे दोनों ने तीन दिन तक छककर खाया। पूरा साँभर खा लेने के बाद दोनों गुनगुनी धूप में पसरे हुए नींद की खुमारी में थे। हम लोगों ने ऐसे दृश्य काफी शूट कर लिए थे। इसलिए मैंने कैमरा बन्द करने को कहा और मचान पर हम सभी आराम की मुद्रा में थोड़ा इत्मीनान में हो गए। दो पल झपकी लेने के बाद जब मैंने फुर्तीली की ओर निगाह डाली तो सामने का दृश्य देखकर सहसा विश्वास नहीं हुआ। सामने के मैदान में तेन्दुए का एक जोड़ा बेफिक्री से फुर्तीली की ओर बढ़ा चला आ रहा था। मैंने तुरन्त कैमरा चालू करने को कहा। तेन्दुए भी अकेले ही रहते हैं। यह जोड़ा, एकदम जवान था और इनके बीच अभी-अभी दोस्ती हुई लग रही थी।

वे एकदम बेफिक्री से चले आ रहे थे। उन्हें इस बात का एहसास तक न था कि वे दो बाघों के एकदम पास आ गए हैं – इतने पास की यह करीबियत उनके लिए घातक हो सकती है। बाघ अपने इलाके में किसी दूसरे शिकारी जानवर को बर्दाश्त नहीं करते हैं खासकर तेन्दुए को तो बिलकुल नहीं। अचानक फुर्तीली के कानों ने हरकत शुरू कर दी। वो दाएँ-बाएँ, आगे-पीछे होते हुए किसी आवाज़ की टोह लेने लगे। दोनों तेन्दुए भी तभी रुक गए। उन्हें जैसे खतरे का एहसास हो गया था। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। फुर्तीली एक झटके-से उनकी ओर लपकी। सुन्दर भी उठ खड़ा हुआ। तेन्दुओं को इतने बड़े खतरे का एहसास बिलकुल न था। वे घबराए हुए भागे और कुछ फर्लांग दूर पर खड़े इकलौते कीकर के पेड़ पर चढ़ गए। कीकर का पेड़ बहुत ऊँचा नहीं था। न ही उसकी डालियाँ बहुत मज़बूत थीं। फिर भी खुद को सन्तुलित रखते हुए दोनों अलग-अलग डालियों पर सुरक्षित पहुँच गए। उनका मुँह फुर्तीली की ओर था। फुर्तीली और उसका साथी सुन्दर नीचे खड़े उन्हें घूर रहे थे। कुछ देर बाद सुन्दर अपने अगले पैरों को पेड़ के तने से टिकाए पिछले पैरों पर सीधा खड़ा हो गया। नर बाघ वैसे भी ऐसा करते हुए अपने अगले पंजों से पेड़ के तने पर खरोंच के निशान लगाते हैं। यह उनके शक्ति प्रदर्शन का एक तरीका है। सुन्दर की इस हरकत पर तेन्दुओं के जैसे प्राण ही सूख गए। वे शाखों पर कुछ पीछे सरकने लगे। पर आगे शाखें इतनी पतली थीं कि वे हिलने लगीं। दोनों ने किसी तरह से खुद को गिरने से बचाया। फुर्तीली और सुन्दर उसी पेड़ के नीचे लेट गए। लेटी हुई फुर्तीली का पूरा ध्यान और कान उस पेड़ पर ही टिके थे। तेन्दुओं की हलकी-सी हरकत पर वो चौकन्नी हो उठ जाती थी। धीरे-धीरे कई घण्टे बीत गए। तेन्दुओं का अब शाखों पर टिके रहना मुश्किल हो गया था। नर तेन्दुआ थोड़ा नीचे आकर एक कुछ मोटी शाखा पर लेट गया। वह सतर्क था। थोड़ी देर बाद जब मादा भी उसी शाख पर आ गई तो नर उसके लिए जगह छोड़कर खुद नीचे उतर आया। और दूसरी शाख पर लेट गया। वे दोनों बुरी तरह थक चुके थे। पेड़ अगर बड़ा और ऊँचा होता तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती। ऊँची और मोटी शाखों पर वे अपने चारों पैर नीचे की ओर लटकाकर आराम से पड़े रहते हैं। वे शायद थकान और प्यास से परेशान थे। डरे हुए भी थे, इसलिए वहाँ से भाग जाना चाहते थे। वे इसकी जुगत भी लगाने लगे थे। फुर्तीली जब भी लेटे-लेटे उन पर गुर्राती तो अब वे भी हलकी गुर्राहट से प्रक्रिया व्यक्त करने लगे थे। जाड़े का सूरज जल्दी डूब जाता है। दोपहर बीते तीन-चार घण्टे बाद ही शाम का माहौल बनने लगा था। इस बीच नर तेन्दुआ उतरने की कोशिश में तने तक आया कि दोनों बाघ उठ खड़े हुए। वो फिर से पेड़ की ऊँचाई पर पहुँच गया।

हम सब के लिए यह अप्रत्याशित था। बहुत थक जाने के बावजूद हम अन्दर से बेहद रोमांचित थे। हालाँकि हम मन ही मन कामना करने लगे थे कि कुछ अप्रिय न घटे। जब नीम अँधेरा पसरने लगा तब मैंने अपने कैमरामैन को सचेत किया कि वह कम रोशनी में काम कर सकनेवाला कैमरा सेट कर लें। मेरा मन उस समय बड़ा विचलित था। अब इतना अँधेरा हो गया था कि नंगी आँखों से केवल तेन्दुओं की हिलती आकृति दिखाई दे रही थी। पूरा जंगल कँपकँपा देनेवाली ठण्ड में दुबक गया था। तेन्दुए के लिए अब एक मौका था। वह तेज़ी-से उतरा और पलक झपकते ही मैदान की ओर भागा। पर फुर्तीली अपने नाम के अनुरूप कुछ ज़्यादा ही फुर्तीली और चौकन्नी निकली। तीन लम्बे छलाँग में वह तेन्दुए के पास पहुँची और अपने अगले पंजे का भरपूर वार उसके सर पर दे मारा। तेन्दुआ डर और घबड़ाहट से काँप रहा था। तभी मादा तेन्दुआ पेड़ से उतरी और उनके उलटी दिशा में भागी। अचानक कुछ दूर भागकर वह रुकी और एक सुरक्षित दूरी बनाकर उन बाघों की ओर दौड़ पड़ी। शायद उन बाघों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कराकर वह अपने साथी को भागने का मौका देना चाहती थी। उसकी इस हरकत से सुन्दर का ध्यान भटका। वह उसकी ओर लपका भी पर फिर नर तेन्दुए की ओर गुर्राता हुआ दौड़ा। तेन्दुए ने बचाव की मुद्रा में गुर्राते हुए अपना पंजा आगे कर दिया। फुर्तीली को मौका मिल गया। उसने पीछे से उसकी कमर पर तेज़ पंजा मारा। तेन्दुआ गुर्राते हुआ घूमा तो सुन्दर ने उसकी गर्दन का ऊपरी हिस्सा अपने मुँह से पकड़ लिया। तेन्दुआ बेदम हो चुका था फिर भी छटपटाए जा रहा था। छटपटाते हुए वह एकदम-से पलट गया। इससे वह बाघ के दाँतों से छूट गया पर दो कदम भागते ही वह गिर पड़ा। फुर्तीली ने फिर से एक पंजा उसकी पीठ पर मारा। तेज़ दर्द भरी चीख के साथ तेन्दुआ वहीं गिर पड़ा। बिना किसी हरकत के। वह बस हाँफ रहा था। सुन्दर ने आगे बढ़कर फिर-से उसकी गर्दन पकड़ ली। तेन्दुए ने अब कोई हरकत न की। वह शान्त पड़ा था। मादा तेन्दुआ कब की ओझल हो चुकी थी। दोनों बाघ वहीं बैठकर सुस्ताने लगे। जब आसमान में चाँद की हलकी रोशनी छिटकी तो वे अलसाए से उठे और साथ-साथ चल दिए...



(चित्र  एवं लेख चकमक अप्रैल 2014 में प्रकाशित )

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