Monday, October 10, 2011

सपने

चलो उठो जरा सा हाथ दो
बादल हटाते है
वो उस तरफ जो दस तारे है
उनको पास लाते है

खड़े कर रास्ते लम्बे
पहाड़ो पे टिकाते है
सुना है लोग आसमानों पे
कुछ मुश्किल से जाते है

तुम्हे भी तो ये आते होंगे
हमको रोज आते है
सुबह उठते है इनको
सोचते है, मुस्कुराते है 

-सुशील कुमार शुक्ल

Saturday, October 8, 2011

बुलबुल के बच्चे

बुलबुल के थे अंडे तीन
उनसे निकले बच्चे तीन
मां उनको नादान समझती
लेकिन वे है बड़े जहीन
कल तक देख नहीं पाते थे
चीं चीं चीं चीं चिचियाते थे

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Thursday, August 4, 2011

क्योंजी बेटा रामसहाय

क्योंजी बेटा रामसहाय 
इतनी जल्दी कैसे आए
अभी तो दिन के दो ही बजे हैं
कहो आजकल बड़े मज़े हैं


Wednesday, April 27, 2011

हाथी आया गाँव में

हाथी आया गाँव में
हाथी आया हाथी आया
सब चिल्लाए गाँव में

उपले पाथ रही थी काकी
बोली देखो देखो आया हाथी

काका दौड़ा दौड़ा आया
अरे महावत हाथी लाया

लगी बताने बूढी दादी
बड़े दिनों में आया हाथी 

हाथी आया गाँव में 
बच्चे देख रहे थे हाथी को
दूर खड़े हो छाँव में

-प्रभात 


इस कविता को एक बार मन में पढो| थोड़ी देर बाद जब इसके अर्थ मन में घुलने लग जाए तो इसे एक बार फिर पढो| भाव के साथ बोल कर| जैसे, अपने  किसी दोस्त को सुनाते हैं वैसे| कहते हैं कविता कुछ पढ़ कर समझ में आती है और समझने के बचे हिस्से में कुछ सुनकर समझ में आती है|

इस कविता में गाँव की एक साधारण घटना है| हाथी का आना| हालाँकि यह कविता हाथी आने की घटना के बारे में नहीं है| जैसे, घर बनाने में ईंट-गारा लगता है| घर को देखो तो वह भी ईंट-गारा दिखता है| पर घर एक जगह होती है जहाँ लोग मिल-जुलकर रहते हैं| घर की मिल-जुल ऊपर से कहाँ दिखती है? इस कविता में भी ठीक यही बात है| हाथी आ जाने की घटना सिर्फ कविता का ईंट-गारा है| असल बात है कि कैसे इतने सारे लोग किसी एक घटना से जुड़े हैं| हाथी का आना जैसे गाँव की झील में उठ गई एक तरंग है जो कि पूरे पानी को छू आती है| उनमें एक हलचल पैदा करती है| कविताएँ हमें बेहतर दुनिया के सपने भी दिखाती हैं| जैसे यह कविता एक सपने के गाँव का सपना लगती है| एक गाँव है जहाँ के लोगों का जीवन एक-दुसरे से गुंथा हुआ है| इस कदर कि एक हाथी की जगह एक चींटी भी आती तो भी एक हलचल होती| इस कविता की मिठास इस गुथन में है| इस संग्रह की लगभग सभी कविताएँ बहुत सारे लोगों के जुड़ावों की कविताएँ हैं| उनको पढ़कर हमारे मन में उतर आने वाला मज़ा इसी मिल-जुल का है|

इसी मिल-जुल का ही तो असर है कि गाँव में जो भी हाथी का आना देख रहा है दूसरे को बताता है - उपले थाप रही काकी चिल्ला कर बता रही है तो काका यही बात बताने के लिए दौड़ लगा रहे हैं जैसे वे सबसे ज्यादा लोगों को सबसे पहले बताना चाहते हैं कि किसी का हाथी देखना छूट न जाए| और गाँव के रहने वाले सभी हाथी को गाँव में आते हुए देख लें| दादी बूढी हैं| उनका अनुभव सबसे ज्यादा है| वे कई बार हाथी को आते देख चुकी हैं| उन्हें याद है कि इस बार बड़े दिनों में आया है| जैसे, हाथी को तो कब का आ जाना था|

इस कविता के बड़े-बुज़ुर्ग बच्चों जैसे दौड़-पुकार कर रहे हैं| बता रहे हैं कि हाथी आया है| और बच्चे?
.. वे मज़े से एक पेड़ की छाँव में खड़े हाथी आते देख रहे हैं| ऐसा क्यूँ? क्या कविता में दिख रहा हाथी हाथी न होकर कुछ और है? कोई मुश्किल है? हाथी की तरह विशाल? गाँव में सब एक-दूसरे को इसके प्रति सचेत कर रहे हैं| हाथी हो या हाथी के रूप में आती कोई मुश्किल हो दोनों ही अर्थों में कविता का केंद्रीय भाव मिल-जुल, साथ, एकजुटता बना रहता है| 

तुम भी लिखो


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रात समंदर है
कितना सारा पानी इसके अन्दर है!

शोभा घारे के इस चित्र को देख कर मन में कई ख्याल आते हैं| दो पंक्तियाँ हमने लिखी हैं| आप भी कुछ लिखिए| अपनी पंक्तियाँ आप नीचे कमेंट्स(comments) में छोड़ सकते हैं|

Thursday, March 31, 2011

Will you?


Teach me to beat that bully
who eats my sandwiches

Teach me to scare the ghosts
that block my way to the bathroom

Teach me to help the puppy
bursting with crackers tied to its tail


Then I'll sit quietly and listen.
And that's a promise.

Rainbow

I raise my hand
to touch the sky
and feel the rainbow

Can you hold me in your arms?
It's high up

Oh no,
I still can't reach it

Will you get me a stool?
Not that one, it's too low

Yes, that's a good size
Let me climb up

Naah!

Maybe I could get a crane to lift me
or drop out of an airplane

All I can touch is this little butterfly
that just flew over my nose

Thank God, they make little rainbows!

कुछ घड़ियाँ गैलीलियो के साथ












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घुड़सवार















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एक घड़ा और गुत्थी सौ



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मीठी चीनी


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Wednesday, March 30, 2011

देखने को बहुत कुछ था

देखने को बहुत कुछ था|

जैसे:
पेड़,
उसका ताना,
उसकी टहनियां,
उसके पत्ते
जो हवा में लहराते थे,
फूल जो उस पर आते थे,
पक्षी जो उसी पेड़ पर घोंसला बनाते थे-
उन घोंसलों में छोटे-बड़े, चितकबरे अंडे, जो कुछ ही दिनों 
में पक्षियों में बदल जाते थे|
देखने को बहुत कुछ था
मेरी कल्पना में|
जैसे:

कऊआ उदास था

कऊआ उदास था|
उदास|  उदास|
कऊआ उदास था|
मुझे यह तो नहीं पता की यह क्यों उदास था, पर था वह उदास| मैंने उसकी आँखों में एक कातर भाव देखा था| इसमें कोई शक नहीं था की वह उदास था| कभी कभी उसके चेहरे पर गुस्सा चमकता था, फिर जल्दी ही वह उदास हो जाता था| गौरैय्या के बच्चे को गिद्ध की निगाह से देखता या उसके अण्डों को तोड़कर सुड़कता, वह उदास बना रहता था| उस वक़्त भी जब यह अन्य कऊओं से लड़ता-झगड़ता था या छत की मुंडेर पर काँव-काँव करता था, यह साफ़ नज़र आता था की वह उदास था| कभी एक तीर की तरह यह नदी की ओर जाता था| या थोड़ी देर किसी डाल पर शान्त बैठा रहता था| फिर उसी उदास भाव से उड़कर अगले कई घण्टों तक गायब हो जाता था| 

-रुस्तम सिंह 

Tuesday, March 29, 2011

ज़मीं को जादू आता है!

ये मेरे बाग की मिट्टी में कुछ तो है
ये जादुई ज़मीं है क्या?
ज़मीं को जादू आता है!

अगर अमरूद बीजूँ मैं, तो ये अमरुद देती है
अगर जामुन की गुठली डालूं तो जामुन भी देती है
करेला तो करेला ....निम्बू तो निम्बू!

अगर मैं फूल माँगू तो गुलाबी फूल देती है
मैं जो रंग दूँ उसे, वो रंग देती है 
ये सारे रंग क्या उसने कहीं निचे छुपा रक्खे हैं मिट्टी में?
बहुत खोदा मगर कुछ भी नहीं निकला.....!
ज़मीं को जादू आता है!

ज़मीं को जादू आता है
बड़े करतब दिखाती है 
ये लम्बे-लम्बे ऊँचे ताड़ के जब पेड़, ऊँगली पर उठाती है
तो गिरने भी नहीं देती!
हवाएं खुद हिलाती हैं, जमीं हिलने नहीं देती!

मेरे हाथों से शर्बत, दूध, पानी 
कुछ गिरे सब ठीक डीक जाती है
ये कितना पानी पीती है!
गटक जाती है जितना दो..

इसे लोटे से दो या बाल्टी से,
या नल दिन भर खुला रख दो
गज़ब है, पेट भरता ही नहीं इसका 
सुना है ये नदी को भी छुपा लेती है अन्दर!
ज़मीं को जादू आता है!
यक़ीनन जादू आता है!!

-गुलज़ार




Friday, March 11, 2011

मकड़ी के जालों से मछली पकड़ते हो.
चढ़ के चवन्नी पे तारों से अकड़ते हो.
क्या चकमक पढ़ते हो?