गदर में ग़ालिब - डॉ. कैलाश नारद


आपने ग़ालिब का नाम जरूर सुना होगा। वे उर्दू के सबसे बड़े शायर कहे जाते हैं। इस कारण विश्व साहित्य में भी उनका नाम है। वे दिल्ली के रहने वाले थे। आखिरी मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ज़फर को खुद भी शायरी का शौक था। ग़ालिब उनके दोस्त थे। सन् 1857 में भारत की पहली जनक्रान्ति हुई। हजारों निर्दोष व्यक्तियों को आज़ादी की इस लड़ाई में अंग्रेज़ों  ने मार डाला। ग़ालिब उन दिनों दिल्ली में थे। अंग्रेज़ों के अत्याचारों को खुद उन्होंने देखा। 
तब उन्होंने एक डायरी लिखी थी-दस्तम्बू, दस्तम्बू  में ग़ालिब ने 1857 में दिल्ली का हाल लिखा है। 
इसमें साधारण आदमी की मुसीबत और भूख तथा प्यास से तड़पते लोगों का भी जिक्र है।

चित्र - गूगल से साभार 


 

ग़ालिब ने दस्तम्बू में लिखा है...
 
अँग्रेज़ों ने दिल्ली में आते ही सीधे-सादे लोगों को मारना शुरू कर दिया। उन्होंने गरीबों के घर भी जला दिए। गोरों के डर से दिल्ली वालों में भगदड़ मच गई। अपनी-अपनी जान बचाकर वे भाग निकले। जिस गली में मैं रहता हूँ उसमें सिर्फ दस-बारह घर थे। गली में घुसने का सिर्फ एक ही रास्ता था। वहाँ कोई कुआँ नहीं था। जो लोग भाग नहीं पाए उन सब ने मिलकर गली का दरवाज़ा भीतर से बन्द कर दिया और वहाँ पत्थर रख दिए । घरों में खाने-पीने का जितना सामान था, धीरे धीरे खत्म होने लगा। पानी की बड़ी दिक्कत थी। लोग बड़ी सावधानी से आहिस्ता आहिस्ता उस पानी को पी रहे थे, लेकिन आखिकार वे घड़े भी खाली हो गए। ऐसे में गली में रहने वाले दो दिन और दो रात तक भूखे-प्यासे समय काटते रहे। लेकिन जब प्यास बर्दाश्त नहीं हुई, तो परेशान लोगों ने गली का दरवाज़ा खोल दिया। वे पानी की वे पानी की तलाश में बर्तन लेकर निकल पड़े। लेकिन पानी तो दूर दूर तक कहीं नहीं था । शोरा बारूद बनाने के काम में आता है। उसी शोरे का पानी जब आसपास मिला तो गली वाले उस पानी को घरों में ले आए। वैसे ज़हरीले पानी को पीकर ही उन्होंने प्यास बुझाई। वह पानी इतना कड़वा और बदबूदार था कि लगा जैसे पानी नहीं, मौत पी रहे हों। एक दिन बरसात हुई । खूब पानी बरसा । हमने एक चादर बाँध ली और एक मटका उसके नीचे रख दिया। वह पानी ही उस वक्त हमारे लिए सबसे बड़ी दौलत थी। असली मुसीबत 5 अक्टूबर 1857 को आई, जब कुछ अँग्रेज़ मेरे घर में घुस आए। उन्होंने मेरे साथ मेरे दोनों बच्चों और नौकरों के साथ ही कुछ पड़ोसियों को भी गिरफ्तार कर लिया। वहाँ से कुछ दूरी पर कर्नल ब्राउन नाम का एक अँग्रेज़ अफसर था। गिरफ्तार किए गए लोग एक-एक कर उसके सामने पेश किए जा रहे थे। ब्राउन का चेहरा सुर्ख था। आँखें भी लाल-लाल थीं। उसकी ऊँचाई छह फुट से भी ज़्यादा थी। उसने मुझसे पूछा, “आप क्या करते हैं?”
मैंने कहा, “उर्दू में कविता लिखता हूँ।”
"तो तुम पोयट हो?” उसने कहा ।
मैंने सिर हिलाकर हामी भरी। “हाँ ।”
मेरे जवाब से ब्राउन को खुशी हुई। उसने अपने सिपाहियों को हुक्म दिया, “इनको इज्ज़त के साथ घर वापस छोड़ आओ।"
मैंने कर्नल ब्राउन से निवेदन किया कि मेरे साथ गिरफ्तार किए गए पड़ोसी बेहद सीधे-सादे लोग हैं। उन्हें भी रिहा कर दिया जाए।
ये लोग भी कविता करते हैं।" मैंने कहा । कर्नल ने उनको भी घर जाने की इजाज़त दे दी। इस तरह कविता के कारण उस रोज़ करीब पचास आदमियों की जानें बच गईं।

चित्र- दिलीप चिंचालकर 

हम गली वालों ने तो किसी तरह अपने प्राण बचा लिए, मगर मैं उन हज़ारों अभागे दिल्ली वालों के बारे में क्या कहूँ, जो हवालात और कैदखाने में बन्द कर दिए गए थे। जेल शहर से बाहर थी और हवालात दिल्ली के भीतर । इन दोनों ही जगहों में बेशुमार बेगुनाहों को ढूँस ढूँसकर भर दिया गया था इस कदर भर दिया गया कि लगता था, आदमी के भीतर आदमी समाया जा रहा हो। साँस लेने में भी दिक्कत हो रही थी। इन दोनों ही कैदखानों के बन्दियों को बाद में फाँसी दे दी गई। नहीं मालूम, कितने लाखों लोग मार डाले गए दिल्ली में अब कुछ ही हज़ार लोग बचे होंगे। बाकी सब, अंग्रेज़ों के गुस्से का शिकार हो गए। बचे सिर्फ वे, जो दिल्ली से भाग गए। वे लोग खुशकिस्मत थे, वरना उन्हें भी फाँसी दे दी जाती। दिल्ली में रहना ही उन दिनों मानों अपराध हो गया था।
 
मेरी पहचान का भिश्ती था चिराग अली। बेहद सीधा आदमी। रोज़ सुबह-शाम नहर का पानी अपनी मशक में भरता और अल्लाह के गुण गाता हुआ सड़कों को सींचा करता। खाने के लिए जो भी रूखी-सूखी मिल जाती उसी को गले के नीचे उतार अपने में मगन रहता। एक रोज़ दिल्ली के बड़े हाकिम हडसन साहब जब सड़क से अपने घोड़े पर सवार होकर निकल रहे थे, चिराग अली सड़क सींच रहा था। उसने हडसन साहब को सलाम नहीं किया, ईश्वर के गुण गाता रहा। हडसन साहब को जो गुस्सा आया, उन्होंने अपनी तलवार से अभागे चिराग अली का पेट चीर डाला और उसकी लाश दिल्ली दरवाज़े पर टाँग दी। इन्हीं डसन साहब ने बादशाह बहादुर शाह जफर के दोनों बेटों शाहज़ादा फज़ल और मिर्ज़ा अबू बकर का भी खून कर उनके सिर दिल्ली दरवाज़े पर लटका दिए थे। हडसन को हिन्दुस्तानियों का खून करने में बड़ा मज़ा आता था।
मेरे पड़ोस में एक गरीब औरत मेहरुन्निसा रहती हैं। उसके पति की मौत को सात साल हुए हैं। अकेली औरत। दूसरों के घर में झाडू लगाकर किसी तरह से अपनी गुजर-बसर करती थी। लेकिन जब घर ही नहीं रहे, बस्ती की बस्तियाँ जला दी गईं तो मेहरुन्निसा काम न मिलने से भूखी मरने लगी। आज उसके यहाँ मैंने दस रोटियाँ पहुँचाईं। दूसरी जो दस रोटियाँ बचीं, उससे मेरे दोनों बेटों और नौकरों का काम चला। मेरे हिस्से में डेढ़ रोटी आई। फिर भी तसल्ली थी कि मेरी रोटियों से मेहरुन्निसा और उसकी दो बेटियों की भूख तो बुझी। मेरा क्या। मेरी तो भूखा रहने की आदत ही हो गई है।
 
मेरा पड़ोसी हीरासिंह एक नौजवान है। वह मुझे हिम्मत बँधाता है। इस आधे वीरान और आधे आबाद शहर में शिवजी राम भी तो हैं जो मुझसे कहते हैं कि मुसीबत के ये दिन कभी-न कभी तो खत्म होंगे। उनका लड़का बालमुकुन्द मुझे अपने पिता की तरह चाहता है। जब बीमार पड़ा, बालमुकुन्द अँग्रेज़ सिपाहियों की • नज़रों से बचते-बचाते एक हकीम को मेरे पास ले आया। हकीम की दवा से मेरी जान बची। मुझे ज़िन्दगी बालमुकुन्द की मदद से ही वापस मिली। दूर के दोस्तों में मेरठ के हरगोपाल तुफ्ता” हैं। वे शायरी करते हैं। उन्होंने मुझे अपने घर मेरठ से नगद रुपया भेजा है। गेहूँ की कुछ बोरियाँ भी “तुफ्ता" के आदमी मेरे घर रख गए हैं। उन्होंने कहला भेजा है कि मैं फिक्र न करूँ। वे मेरी मदद हर किस्म से करते रहेंगे।
 
ये बातें, जिनका लिखना ज़रूरी नहीं था, सिर्फ इसलिए लिखीं कि इन लोगों की दरियादिली और हमदर्दी का शुक्रिया अदा हो जाए। रातों को चिराग नहीं जलते। दिन में चूल्हे नहीं सुलगते। जब अनाज ही नहीं है तो चूल्हे कहाँ से जलें? मकानों के मालिक मार डाले गए हैं। वे होते तो घरों में गल्ला, पानी आता। ग़ालिब, जिसके इस शहर में हज़ारों दोस्त थे, इस तनहाई और अकेलेपन में सिर्फ अपनी कलम के सहारे ही ज़िन्दा बचा रह गया है। उसके सारे दोस्त एक-एक कर मार डाले गए। मेरी आत्मा में अब केवल दुख ही दुख है। मैं अपना बिस्तर और कपड़े बेच-बेच कर ज़िन्दगी गुज़ार रहा हूँ। दूसरे लोग जिस तर से रोटियाँ खाते हैं, मैं कपड़े खा रहा हूँ। डरता हूँ कि जब सब कपड़े खा लूँगा, तो नंगा ही भूखा मर जाऊँगा।

(चकमक, दिसम्बर 2008 में प्रकाशित)

Comments

  1. मार्मिक और अद्भुत जानकारी

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